Man iska rahasya evam niyantran मन इसका रहस्य एवं नियंत्रण
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सुख सदा से प्रत्येक मनुष्य का प्रधान उद्देश्य रहा है। मनुष्य की सारी क्रिया जीवन में अधिकतम सुख अर्जित करने की ओर निर्देशित रहती है। 'वस्तुयें उसे सुख देंगी,' इस भ्रामक धारणा के कारण मनुष्य उन्हें बाहर खोजता है। परिणाम यह होता है कि आजीवन प्रयास के बावजूद उसे केवल निराशा मिलती है। हर जगह केवल उत्पीड़न और दुख दिखाई पड़ता है। वास्तविक चिरस्थायी सुख मनुष्य के अंदर स्थित है। यह सुख या आनंद अंदरुनी आत्मा, अंतरात्मा है। आत्मा का स्वभाव ही शुद्ध हर्ष है। इसका बोध कभी नहीं होता क्योंकि मन पूर्णतः बाहर रहता है। जब तक मन बेचैनी से वस्तुओं के बीच भ्रमण करता रहेगा, सदा अस्थिर रहेगा, उत्तेजित, आन्दोलित और अनियंत्रित रहेगा, तब तक इस सच्चे हर्ष का अनुभव और उपभोग नहीं हो सकता। बेचैन मन को नियंत्रित करना और सभी विचारों एवं ललकों को पूर्णतः शांत करना मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या है। यदि वह मन पर आधिपत्य कर लेता है तो वह बादशाहों का बादशाह है।
मन पर स्वामित्व प्राप्त करने के लिए आपको जानना होगा कि यह क्या है, कैसे काम करता है, हर मोड़ पर कैसे आपको ठगता है और किन विधियों से इसे वश में किया जा सकता है। इस पुस्तक में इस विषय का वर्णन है। इसमें मन की प्रकृति को, इसके द्वारा धारण कियेगये विविध रूपों को, इसकी आन्तरिक क्रिया के रहस्यों को और इसे नियंत्रित करने के तरीकों को पूरी तरह और स्पष्टतः समझाया गया है। पूर्ववर्ती संस्करण हजारों आकांक्षियों द्वारा उत्सुकता से पढ़े गये और कद्र किये गये जिन्होंने लिखा कि इसके अनुदेशों से उन्हें अत्यधिक सहायता मिली। पाठ और अनुदेश उत्कृष्ट रूप में व्यावहारिक हैं। अनेक सहायक विचार और सुझाव जो मेरे ध्यान की अवधि में प्रकट हुये थे, यहाँ अंकित किये गये हैं। एकाग्रता और ध्यान के लिए बहुत उपयोगी संकेत इस पुस्तक में मिलेंगे जिन्हें यदि सच्चाई से ग्रहण किया जाय तो कम समय में ही सफलता अवश्य मिलेगी।
सभी आकांक्षियों से मैं प्रार्थना करता हूँ कि बहुमूल्य अनुदेशों को सदा ध्यान से पढ़ें और अपनी साधना तथा दैनिक जीवन में व्यावहारिक संकेतों को अपनायें।

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